नफरत

नफरत फैला रहे हो
फिर भी अपने को इंसान कहला रहे हो ।
कैसी विडंबना है तुम्हारे समाज की,
खुद को सुपरमैन जता रहे हो ॥
इंसानियत के दलालत की रोटी,
बड़े ही मेहनत की कमाई बता रहे हो ।
वह भूखे रहते हैं तुम खून पीते हो,
आरोप उन पर, अपना दामन साफ दिखा रहे हो ॥
तुम्हारा अक्स अब पहचान में आने लगा है,
लगातार नए-नए मुखोटे दिखा रहे हो ।
कब तक छुपाओगे अपनी असलियत को,
दिन को छोड़ो अब रात में भी तुम नजर आ रहे हो ॥

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