गांव अब वो गांव नही ।

गांव, अब वो गांव नहीं है,
प्यार भरे हाथ पांव नहीं है।
बैल, बैलगाड़ी के दर्शन नही,
बागियों में अब वो छांव नहीं है॥
गांव, अब वो गांव नहीं है...

पल-पल में बदल रहे लोगों के मन,
सावन की कुश्तियों में प्रेम के दांव नहीं है।
होली के पावन पर्व में घुल गए खून के रंग,
छोटी-छोटी बातों के मिटते अब घाव नहीं है॥
गांव, अब वो गांव नहीं है...

दूध-दही की नदियों में खूब चढ़ता था प्यार,
तालाबों के घाटों में खिलखिलाहट मे चाव नहीं है।
नफरत और धन की दौड़ मे झगड़ों की बौछार,
सूखी नदियों में चले ऐसी प्रेम की कोई नाव नही है॥
गांव, अब वो गांव नहीं है...


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