गिरना

गिरना

गिरने को क्या है,
कहीं गिर जाओ,
चलना है,
गिरना है,
फिर चलना है।

सभी गिरते हैं,
कोई घर पर गिरता है,
कोई सड़क पर गिरता है,
कोई पानी में गिरता है,
कोई आसमान मे गिरता है,
यहां तो लोग खुद में गिर जाते हैं।

गिर गया सो गिर गया,
कोई पैसे के लिए गिरता है,
कोई प्यार के लिए गिरता है,
बहाने बहुत हैं गिरने के,
न जाने किस-किस लिए गिरता हैं,
हद तो तब है,
जानबूझकर लोग गिरते जाते हैं।

गिर गया तो गिर गया,
कोई उठा तो कोई उठकर गिर गया,
कोई सम्हला तो फिर फिसल गया,
संभलने का भी कोई अंत नहीं,
संभल कर भी गिरते जाते हैं।

गिरो, और गिरो,
बताते हैं मैं ही नहीं,
हर कोई तो गिर रहा है,
कोई कम तो कोई ज्यादा,
गिर जरूर रहा है,
गिरने में भलाई गिनाते हैं।

अब तो हद हो गई है,
कई लोगों के गिरने से ही,
समाज में प्रतिष्ठा बढ़ गई है,
गिरने का रिकॉर्ड बनाते जाते हैं।

देखा देखी,
सब गिरने लगे हैं,
गिरकर सीना तनने लगे हैं,
गिरने की मिसाल बनने लगे हैं,
देखते-देखते,
समाज बदल गया,
गिरने का रिवाज बन गया,
अच्छा कुछ बचा ही कहां है,
गिरे हुए ही याद किए जाते हैं।

अजीब सा लग रहा है,
गिरने वालों के सामने,
सबका सर झुक रहा है,
इन सबके बीच में,
सर अपना ऊपर नहीं उठ रहा है,
गिरने वाला हंस रहा है,
अकेला देखकर,
हम खुद में डूब जाते हैं ॥

जय भारत !
जय जय जय !
©विनोद सचान
सर्वाधिकार सुरक्षित !

#सबकीबात #बीतीबातें #विनोदकीलात

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