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गांव अब वो गांव नही ।

गांव, अब वो गांव नहीं है, प्यार भरे हाथ पांव नहीं है। बैल, बैलगाड़ी के दर्शन नही, बागियों में अब वो छांव नहीं है॥ गांव, अब वो गांव नहीं है... पल-पल में बदल रहे लोगों के मन, सावन की कुश्तियों में प्रेम के दांव नहीं है। होली के पावन पर्व में घुल गए खून के रंग, छोटी-छोटी बातों के मिटते अब घाव नहीं है॥ गांव, अब वो गांव नहीं है... दूध-दही की नदियों में खूब चढ़ता था प्यार, तालाबों के घाटों में खिलखिलाहट मे चाव नहीं है। नफरत और धन की दौड़ मे झगड़ों की बौछार, सूखी नदियों में चले ऐसी प्रेम की कोई नाव नही है॥ गांव, अब वो गांव नहीं है...

पड़ाव

नदी की तरह आगे बढ़ते रहो ॥ कहीं सकरापन होगा, तो कहीं उथलापन होगा। कहीं उठना होगा, तो कहीं गिरना होगा ॥ कहीं तेजी से, तो कहीं ठिठकना होगा। जब तक मिले न लक्ष्य, चलना होगा, चलना होगा ॥ यह तो तय है कि आगे, समुद्र तो कहीं न कहीं होगा ही होगा॥

अलगाव

विभाजन की रेखाएं अब प्रकट होने लगी हैं । पहले हिंदू-मुस्लिम में फिर हिंदू-सिक्ख में फिर अगड़ा-पिछड़ा में फिर अगड़ा-दलित में अब काफी से स्पष्ट हो गए हैं॥ जो मनुष्य के अंदर कांटे बो गए हैं । आज मनुष्य के शरीर का हर हिस्सा, अपने देश के हिस्से में बदल रहा है ॥ आदमी का शरीर देश की तकदीर सब बदल रही है । एक-एक अंग कर रहा है चीत्कार, एक साथ रहना अब नहीं है स्वीकार ॥ हम अपना राजकाज सब अलग-अलग चलायेंगे । नए सिरे से फिर अपना-अपना देश बनाएंगे ॥

नफरत

नफरत फैला रहे हो फिर भी अपने को इंसान कहला रहे हो । कैसी विडंबना है तुम्हारे समाज की, खुद को सुपरमैन जता रहे हो ॥ इंसानियत के दलालत की रोटी, बड़े ही मेहनत की कमाई बता रहे हो । वह भूखे रहते हैं तुम खून पीते हो, आरोप उन पर, अपना दामन साफ दिखा रहे हो ॥ तुम्हारा अक्स अब पहचान में आने लगा है, लगातार नए-नए मुखोटे दिखा रहे हो । कब तक छुपाओगे अपनी असलियत को, दिन को छोड़ो अब रात में भी तुम नजर आ रहे हो ॥